प्रोफाइल फोटो कुमार सर्वजीत


बोधगया केवल बिहार का एक पर्यटन स्थल नहीं है। यह वह पवित्र भूमि है, जहां सिद्धार्थ गौतम को ज्ञान प्राप्त हुआ और जहां से बौद्ध दर्शन का संदेश दुनिया के अनेक देशों तक पहुंचा। महाबोधि मंदिर की वैश्विक प्रतिष्ठा, विभिन्न देशों के बौद्ध मठों की उपस्थिति और अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों की निरंतर आवाजाही इसे बिहार की सबसे विशिष्ट सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक संपत्तियों में स्थान देती है। स्वाभाविक रूप से, ऐसी विरासत से जुड़ा शहर पर्यटन, रोजगार, स्थानीय कारोबार और अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक संबंधों का एक मजबूत केंद्र होना चाहिए।

                 लेकिन बिहार का मुकुट और विश्व धरोहर बोधगया आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। पर्यटन का पीक सीजन शुरू हो चुका है, लेकिन होटलों में केवल 30% बुकिंग है। 200 करोड़ रुपये का भारी नुकसान केवल एक आंकड़ा नहीं है, यह बोधगया की अर्थव्यवस्था की रीढ़ टूटने का प्रमाण है। सरकार विज्ञापनों में “इन्वेस्ट बिहार” और “स्मार्ट सिटी” का ढिंढोरा पीट रही है, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि बोधगया का यह पर्यटन संकट कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि वर्तमान सरकार की ‘निर्मित आपदा’ (Man-made Disaster) है।

*1. NCAER की रिपोर्ट और रोज़गार की हत्या*

नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) के एक विख्यात शोध के अनुसार, पर्यटन एक ऐसा सेक्टर है जिसके विकास से 32 अलग-अलग प्रकार के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोज़गार (Direct & Indirect Employment) सृजित होते हैं। इनमें टूर गाइड, टैक्सी ड्राइवर, हस्तशिल्प कलाकार, धोबी, स्थानीय किसान और छोटे रेस्तरां वाले शामिल हैं। आज जो होटलों की 70% बुकिंग रद्द हुई है, उसने केवल होटल मालिकों को नहीं, बल्कि इन सभी क्षेत्रों से जुड़े हज़ारों स्थानीय युवाओं और कामगारों के रोज़गार की हत्या की है। सरकार की नाकामी ने इनसे इनका निवाला छीन लिया है।

*2. राजनीतिक द्वेष ने छीना बोधगया का ‘कनॉट प्लेस’*

जब हमारी सरकार थी, तब हमने बोधगया की वैश्विक महत्ता को समझते हुए दिल्ली के ‘कनॉट प्लेस’ (CP) की तर्ज़ पर एक विश्वस्तरीय, सुव्यवस्थित बाज़ार विकसित करने की योजना बनाई थी, ताकि पर्यटन से जुड़ी रोज़गार  को एक स्थायी और भव्य ठिकाना मिल सके। लेकिन वर्तमान सरकार ने केवल ‘राजनीतिक ईर्ष्या’ के चलते उस शानदार प्रोजेक्ट को डस्टबिन में डाल दिया। आज नतीजा यह है कि स्थानीय दुकानदार फुटपाथ पर धक्के खा रहे हैं और विदेशी पर्यटकों को अतिक्रमण, जाम और अव्यवस्था का सामना करना पड़ रहा है।

*3. लावारिस महाबोधि: BTMC का अस्तित्व ही खत्म*

बोधगया का हृदय महाबोधि मंदिर है और उसे चलाने वाली धड़कन बोधगया मंदिर प्रबंधन समिति (BTMC)। यह सरकार की घोर प्रशासनिक नाकामी है कि 16 जुलाई 2026 को BTMC बोर्ड का कार्यकाल खत्म हो गया और आज तक नई समिति का गठन नहीं हुआ। जिस संस्था को अंतरराष्ट्रीय डेलिगेशन और विदेशी भिक्षुओं के साथ समन्वय करना था, वह खुद लावारिस है। बिना नेतृत्व और प्रबंधन के विदेशी पर्यटक आखिर क्यों आएंगे?

*4. अंधेरे में डूबा स्मार्ट सिटी और बदहाल ढांचा*

बोधगया में अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट होने के बावजूद वियतनाम जैसी अहम उड़ानें रद्द हो रही हैं। जो पर्यटक आ रहे हैं, उन्हें बिजली की भारी कटौती का सामना करना पड़ रहा है। जिस अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल पर 24 घंटे निर्बाध बिजली होनी चाहिए, वहां शाम ढलते अंधेरा छा जाता है। होटलों का खर्च डीज़ल जेनरेटरों से बढ़ रहा है और फुटपाथ के कारोबारी अंधेरे में व्यापार करने को मजबूर हैं।

*5. पर्यटकों की जीवनशैली से कटी सरकार (शराबबंदी का प्रभाव)*

हम एक ज़िम्मेदार विपक्ष के तौर पर शराबबंदी के सामाजिक उद्देश्य का सम्मान करते हैं, लेकिन सरकार को अंतरराष्ट्रीय पर्यटन की बुनियादी समझ ही नहीं है। विदेशी पर्यटक अपनी जीवनशैली, सहूलियत और उत्साह के लिए छुट्टियां मनाने आते हैं, न कि स्थानीय सरकार के नियम-कायदे रटने। सरकार ने शराबबंदी लागू की, लेकिन बोधगया में विदेशी पर्यटकों के लिए न तो कोई विशेष ढांचा बनाया और न ही उनके लिए कोई ऐसे विश्वस्तरीय वैकल्पिक आकर्षण विकसित किए जिससे उनका अनुभव बेहतर हो। पर्यटकों ने इसका जवाब अपनी बुकिंग रद्द करके दे दिया है।


*बोधगया के विकास का रोडमैप कहां है?*

मैं सरकार के सामने कुछ स्पष्ट मांगें रखना चाहता हूं।

*पहली मांग:* बोधगया के पर्यटन कारोबार की स्वतंत्र समीक्षा कराई जाए। होटल बुकिंग, पर्यटकों की संख्या, स्थानीय कारोबार और रोजगार पर प्रभाव के आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं।साथ ही संबंधित होटल संघों, व्यापारियों और अन्य हितधारकों के साथ मिलकर वास्तविक आर्थिक प्रभाव का आकलन हो।

*दूसरी मांग:* कनॉट प्लेस की तर्ज पर प्रस्तावित बाजार परियोजना सहित लंबित विकास योजनाओं की वर्तमान स्थिति सार्वजनिक की जाए। उनके क्रियान्वयन की समयसीमा और जिम्मेदार विभागों की जानकारी दी जाए।

*तीसरी मांग:* BTMC के पुनर्गठन और संस्थागत संचालन के संबंध में समयबद्ध निर्णय लिया जाए। मंदिर प्रबंधन और पर्यटन से संबंधित व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी स्पष्ट हो।

*चौथी मांग:* बोधगया के लिए एक समेकित पर्यटन विकास योजना बनाई जाए, जिसमें अंतरराष्ट्रीय उड़ानें, बिजली, सड़क, स्वच्छता, बाजार, सांस्कृतिक गतिविधियां और स्थानीय रोजगार शामिल हों।

*पांचवीं मांग:* स्थानीय युवाओं, महिलाओं और छोटे कारोबारियों को पर्यटन अर्थव्यवस्था से जोड़ने के लिए कौशल प्रशिक्षण, विपणन सहायता और बाजार तक पहुंच की व्यवस्था की जाए।

इन मांगों का उद्देश्य केवल सरकार की आलोचना करना नहीं है। हमारा उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बोधगया की संभावनाएं वास्तविक विकास में बदलें और स्थानीय जनता को उसका लाभ मिले।

बोधगया को लेकर हमारी दृष्टि स्पष्ट है। यहां धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जाना चाहिए। विकास परियोजनाओं को राजनीतिक मतभेदों से ऊपर रखा जाना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय पहचान के अनुरूप सुविधाएं विकसित की जानी चाहिए और स्थानीय लोगों को पर्यटन से पैदा होने वाले अवसरों का वास्तविक लाभ मिलना चाहिए।

यदि हमारी पूर्ववर्ती योजनाओं में कोई कमी थी, तो उसकी समीक्षा हो सकती है। यदि किसी परियोजना में सुधार की जरूरत है, तो सुधार होना चाहिए। लेकिन जनता के हित की परियोजनाओं को बिना स्पष्ट कारण के रोक देना या उनकी उपेक्षा करना स्वीकार्य नहीं हो सकता।

सरकार को विज्ञापनों में बिहार की संभावनाएं गिनाने के साथ-साथ धरातल पर परिणाम भी दिखाने होंगे।

बोधगया में पर्यटकों की संख्या बढ़े, स्थानीय कारोबार मजबूत हो, युवाओं को रोजगार मिले और मंदिर प्रबंधन प्रभावी ढंग से चले—यही वास्तविक विकास की कसौटी है।

*निष्कर्ष:*

बोधगया किसी दल का नहीं, बिहार की जनता का है।
बोधगया की विरासत हजारों वर्षों की है। कोई सरकार कुछ वर्षों के लिए शासन कर सकती है, लेकिन इस विरासत के संरक्षण और विकास की जिम्मेदारी सभी सरकारों पर समान रूप से लागू होती है।

आज यदि पर्यटन कारोबार में गिरावट की शिकायतें हैं, यदि बाजार परियोजनाओं की स्थिति स्पष्ट नहीं है और यदि BTMC के पुनर्गठन में देरी को लेकर सवाल उठ रहे हैं, तो सरकार को सामने आकर जवाब देना चाहिए। जनता को आश्वासन से अधिक पारदर्शिता और घोषणाओं से अधिक परिणाम चाहिए।
मैं सरकार से अपील नहीं, बल्कि जनहित में जवाबदेही की मांग करता हूं। बोधगया के होटल व्यवसायियों, टैक्सी चालकों, दुकानदारों, हस्तशिल्प कलाकारों और युवाओं की आजीविका को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उनकी समस्याओं का समाधान राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, ठोस नीतिगत निर्णयों से होगा।

बोधगया को राजनीतिक प्रतिष्ठा की लड़ाई का मैदान नहीं, विकास और रोजगार का केंद्र बनाइए।

बिहार की सांस्कृतिक विरासत हमारी साझा पूंजी है। इसे संरक्षित करना, इसकी पर्यटन क्षमता को विकसित करना और इससे जुड़े परिवारों की आजीविका को सुरक्षित करना सरकार की जिम्मेदारी है। हम विपक्ष में रहते हुए इस विषय को उठाते रहेंगे, सरकार से सवाल पूछते रहेंगे और बोधगया के विकास के लिए व्यावहारिक विकल्प प्रस्तुत करते रहेंगे।
क्योंकि बोधगया का सम्मान केवल बिहार का सम्मान नहीं—यह उस विरासत का सम्मान है, जो पूरी दुनिया को शांति और मानवता का संदेश देती है।
कुमार सर्वजीत
(MLA बोधगया)

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